प्रद्युम्न हत्याकांड: अशोक की इज्जत उतारने वाला मीडिया क्या अब माफ़ी मांगेगा?

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रेयान इंटरनेशनल स्कूल से जब प्रद्युम्न की हत्या की ख़बर आई थी तो मीडिया ने भी इस ख़बर को हाथों हाथ लिया और मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे काफी एयरटाइम दिया गया.पूरा दिल्ली और देश सकते में था. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक बड़े स्कूल में इस तरह की घटना ने लोगों को, खासकर अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया था.

अशोक की  इज्जत उतरने वाला मीडिया क्या अब माफ़ी मांगेगा?

रायन इंटरनैशनल स्कूल में हुए प्रद्युम्न हत्याकांड में जिस दिन स्कूल बस के कंडक्टर अशोक कुमार को गिरफ्तार किया था, उसी दिन प्रद्युम्न के पिता ने कहा था कि उन्हें हरियाणा पुलिस की थिअरी पर कतई भरोसा नहीं है। अब सीबीआई जांच से सामने आए ‘सच’ से हर कोई भौचक है। कोई इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रहा कि सिर्फ एग्जाम और पीटीएम टालने के लिए किसी मासूम बच्चे की हत्या की जा सकती है। सीबीआई जांच में पता चला है कि आरोपी कई दिनों से इसके लिए कोई तरीका खोजने में जुटा था और आखिरकार उसे हत्या के सिवा कोई और रास्ता नहीं सूझा। उसे लगता था कि ‘कुछ बड़ा’ होने पर ही स्कूल को बंद किए किया जाएगा।

केंद्रीय जांच एजेंसी ने हरियाणा पुलिस द्वारा मुख्य आरोपी बनाए गए कंडक्टर अशोक कुमार को एक तरह से क्लीन चिट दे दी है। हरियाणा पुलिस ने दावा किया था कि प्रद्युम्न का यौन उत्पीड़न करने की कोशिश के दौरान अशोक ने उसे मार डाला था, लेकिन सीबीआई को अपनी जांच में उसके खिलाफ कुछ नहीं मिला। न ही प्रद्युम्न के यौन उत्पीड़न का कोई सबूत मिला।

अगले कुछ दिनों तक मीडिया में प्रद्युम्न छाया रहा. हत्या के बाद अभिभावकों में भय था कि क्या उनके बच्चे स्कूल की बसों से लेकर कैम्पस की चाहरदीवारियों और कक्षाओं में सुरक्षित हैं. यह भय ही मीडिया का भात बन गया था. भात पक रहा था. प्रद्युम्न पर महाकवरेज जारी थी. तरह-तरह के क्रूर अलंकारों से अशोक का चेहरा और कहानी लोगों को बताई जा रही थी. स्कूलों में हर गरीब, मैला कुचैला कामगार, चपरासी, बस ड्राइवर, कंडक्टर, रिक्शेवाले, सब संदेह से देखे जा रहे थे.

अब अशोक की छवि को सुधारने के लिए क्या होगा मीडिया का रोल?

लेकिन हत्या के कुछ ही देर बाद पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया और उसका इकबालिया बयान लोगों को सुना दिया गया. बस कंडक्टर अशोक अब लोगों की नज़र में एक हत्यारा था. एक नृशंस, वहशी, दरिंदा जिसकी तुलना हैवान से हो रही थी . टीवी की स्क्रीन पर एक ओर मासूम प्रद्युम्न का चेहरा था, दूसरी ओर रोती हुई मां और तीसरा ये हत्यारा.

अशोक की छवि को इतना बुरा किया जा चुका था कि वकीलों ने उसके मामले में पैरवी तक से मना कर दिया. कह दिया गया कि इसपर मुक़दमा चलाए बगैर फांसी पर चढ़ा दिया जाए. टीवी पर अशोक की जघन्यता के लंबे-लंबे एपीसोड इस गुस्से को और पुख्ता करते जा रहे थे. गांववालों ने अशोक का बहिष्कार कर दिया था. जाति समाज से बेदखल अशोक सीखचों के पीछे अबतक बंद है.

अब कहानी का खलनायक बदल चुका है.

वो अशोक जिसे समाज अपनी नज़रों और दिल में मार चुका है, बार-बार उसको मौत के घाट उतार चुका है,  वो अब इस हत्याकांड का आरोपी नहीं है. सीबीआई के हवाले से बताया जा रहा है कि हत्यारा दरअसल उसी स्कूल की 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला एक 16 वर्ष का छात्र है.

पूछताछ के दौरान आरोपी स्टूडेंट ने सीबीआई को बताया, ‘मुझे कुछ समझ नहीं आया। मैं पूरा तरह ब्लैंक हो गया था और बस मैंने उसे मार डाला।’ सीबीआई ने बताया कि अशोक को आरोपी बताते हुए हरियाणा पुलिस ने जिस चाकू को ‘हत्या के हथियार’ के तौर पर पेश किया था, आरोपी स्टूडेंट ने उसी का इस्तेमाल किया था। इस चाकू को हरियाणा पुलिस ने टॉइलट के कमोड से बरामद किया था। सीबीआई के मुताबिक, क्राइम स्पॉट का कई बार निरीक्षण, सीसीटीवी फुटेज की गहन जांच, कॉल रेकॉर्ड्स खंगालने और टीचर्स, स्टूडेंट्स सहित कई लोगों से पूछताछ के बाद वह आरोपी तक पहुंच पाई।

अब हत्यारे की स्क्रिप्ट के शब्द बदल गए हैं. वो पॉर्नएडिक्ट है. स्कूल में पॉर्न क्लिप्स देखता है. उद्दंड है. लड़का है. बदतमीज़ है. पढ़ने में कमज़ोर है. मनोरोगी है. ऐसी कई कहानियां उसके बारे में सुनने जानने को मिल रही हैं. मीडिया के कैमरे अब एक नए हत्यारे को मौत की सज़ा सुनाने में जुट गए हैं.

क्या समाज दोबारा अशोक को अपने दिल वही जगह देगा?

लेकिन इस दौरान पुलिस से कोई नहीं पूछ रहा है कि नए हत्यारे की कहानी में कितने ही अनुत्तरित सवालों पर वो खामोश क्यों है. पुलिस के जिन अधिकारियों ने अशोक को बयान बदलने के लिए और जबरन इकबालिया बयान के लिए बाध्य किया था, उनपर कार्रवाई की मांग कोई नहीं कर रहा है और न ही उनके खिलाफ मामले को उलझाने का आरोप लगाकर कोई मामला दर्ज किया जा रहा है.

जिस बार काउंसिल ने न्यायाधिकरण की दहलीज पर पहुंचने से पहले ही अपना फैसला सुना दिया था और अशोक की पैरवी करने से इनकार कर दिया था, उनसे अशोक का परिवार पूछ रहा है कि क्या वो अब इस लड़के की पैरवी करने से भी इनकार करेंगे और ऐसे कितने मामलों में वकील अपने फर्ज़ और पेशे से अलग होते रहेंगे.

 बड़ा सवाल: मीडिया का रोल कैसा होना चाहिए?

सबसे बड़ा सवाल तो मीडिया से ही है कि लगातार, बार-बार अशोक की खाल खींचने में लगे मीडिया ने जिस तैयारी के साथ उसे अपराधी घोषित किया और उसके सामाजिक-पारिवारिक अस्तित्व को हर क्षण ध्वस्त किया, क्या उसे कम से कम एकबार अशोक की छवि के साथ ऐसा खेल खेलने की अपनी गलती के लिए माफी नहीं मांगनी चाहिए.

अब सोशल मीडिया पर भी कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर स्कूल के टीचरों, आरोपी बच्चे के अभिभावकों ने इस बात को वक्त रहते क्यों नहीं समझा। अगर बच्चे की दिलचस्पी पढ़ाई में ज्यादा नहीं थी, तो उसे समझाया जा सकता था कि एग्जाम में अगर उसके नंबर अगर कम भी आए तो भी कोई बात नहीं। अगर उस पर पढ़ाई का ज्यादा बोझ नहीं डाला जाता, अच्छे नंबर लाने के लिए नहीं कहा जाता, अगर उसकी काउंसलिंग की जाती तो शायद वह इस हद तक कभी नहीं जाता। अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि बच्चों को उनकी दिलचस्पी के हिसाब से ही तालीम दी जाए, किसी बच्चे पर ‘गला काट’ प्रतिस्पर्धा का बोझ इतना न डाल दिया जाए कि वह किसी छोटे बच्चे का गला रेतने को ‘मजबूर’ हो जाए।

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